“शरण गहु मै किसकि?”

राज चाहे पाण्डव का हो या कौरव का गरिब जनता और असहाय नारि कि व्यथा किसी के समझ मे नहि आति। सबको सत्ता का मोह है और ये सत्ता या कुर्सी का मोह प्राचिन (द्वापर-त्रेता) युग से सोनिया-मोदि (कलियुग) युग तक एक समान है। अन्तर सिर्फ़ इतना है पह्ले के समाज​-सुधारक और गुरु राजनिति के मार्गदर्शक होते थे, और आज वो खुद राजनिति के सुत्रधार होते थे। राजनिति कल भी छलने कि कला थी, आज भी छलियो और दगाबाजो कि जमात हि अग्रिणि भुमिका मे है।

और बेचारि जनता उसे आजतक पता नहि-“शरण गहु मै किसकि?”

नारि कि स्थिति तो और भी दयनिय है, आज हरियाणा कि हालात देख ले, पिछ्ले महिने औग्स्त मे १० से भी जयादा बलात्कार कि घटना दर्ज हुइ है, जो दर्ज नहि उस आक्ड़ो पे धयान भी नहि।

राज चाहे कौरव का हो या पाण्डवो का गरिब जनता का हाल तो बुरा हि रह्ता है। राज अगर कौरव का हो तो द्रौपदि का चिड़-​-हड़्ण होगा अगर पान्ड्वो कि हो तो द्रौपदि(गरिब जनता) जुए मे हारि जायेगि, दोनो हि परिस्थिति मे जनता के साथ कोइ नहि।

प्राचिन काल मे जब वैशालि मे गण्तन्त्रा कि पहलि-पहल वयव्स्था हुए थि तब राज जनता का, जनता के द्वारा , जनता के लिये चलाया गया शासन था, मगर आज यहि गण्तान्त्रीक वयव्स्था भ्रस्तो का भ्रस्तो के द्वारा भ्रस्तो के लिये चलाया गया शासन है।

तभी!!!! इस भ्रस्ताचार रुपि वयव्स्था का अन्त करने के लिये चमत्कारिक रुप से एक कृष्ण का उदय हुआ, उदय हुआ श्री अन्ना हजारे का,उनके साथ आये पाण्डव सेना और हम सभि को (आम-इन्सान) शायद उन्हि का इन्तजार था। सत्ताधारि दल ने उन्को कइ प्रलोभन दिये, डराया-धमकाया मगर श्री अन्ना हज़ारे टस से मस नहि हुए। यहा गल्ति हमने (आम-इन्सान) कि, हमने उन्हे ((पाण्ड्वो) हिरो (नायक्) बना दिया,हमने उन सभि को शिखर पे खरा कर दिया,उन्हे सत्ता की शक्ति और मह्त्वा दिखाया, परिणाम-स्वरुप वो (पाण्ड्व ) सत्तालोलुप हो गये। और – “विनाश कालाय विपरित बुद्धि।” पाण्ड्वो ने कृष्ण का त्याग कर दिया और राजनिति कि पथ के पथिक हो गये। बेचारे कलियुगि कृष्ण हक्के बक्के हो गये, वो अलग हि इन राजनेताओ कि जमात के खिलाफ़ खरे है और आगे भि वो इन भ्रस्त राजनेताओ के खिलाफ़ मशाल जलाकर लोगो मे अलख जगाते रहेङे।

Image

पाण्डव सेना के अग्रिणि श्री केजरिवाल कभि खबरिलाल बन जाते है कभि बिजलि मिस्त्रि, उन्हे अब भान नहि रहा कि इस पथ पे आगे क​एसे बधे, अब तो श्री हजारे रुपि कृष्ण भि नहि है पथ-प्रदर्षक के रुप मे, अब वो भट्क रहे है, कभि इस पथ पे कभि उस पथ पे! पथ भ्रस्त हो गये है श्री केजरिवाल !

सत्ता का मोह हि एसा है, ये बुद्धि क नाश कर देता है, पतन कि सुरुवात हो गयि है, पतन इमानदारि और देश्-भक्ति कि, पतन चरित्र कि, हाँ कल को वो कुछ सिटे शायद जित आवे, ५ या ६ सिटे लोक-सभा मे , फ़िर क्या? फ़िर सरकार को गिराने या बचाने के अलवा और कुछ कर भि नहि पायेंगे। क्युकि आक्ड़ो के खेल मे वो काफ़ि छोटे खिलाड़ि होंगे। सत्ता के शिर्ष पे जाने का सपना चुर्-चुर होना तय है।

कल ईतिहास कहेगा श्री हजारे का साथ छोर जाने वाला गद्दार है या शायद कुछ लोग उन्हे महान राज्नेताओ के श्रेणि मे रख भि दे, तो राजनेता कि इज्जत है हि कितनि? बस उतनि हि इज्जत मिलेगि केजरिवाल जि को।

नुकसान किसका?

नुकसान हुआ है आम-इन्सान का, क्युकि हमे एक और दल नहि चाहिये था, हमे इसे लोग चाहिये थे जो भ्र्स्ताचार रुपि दानव का दलन(दमन्) करे ना कि उसि भ्रस्त वयब्स्था का हिस्सा बन जाये।और लगे हमारा (आम्-इन्सान) खुन चुसने जैएसे दुसरे चुसते है, रक्त्-पिपासु राजनेता रुपि दैत्य ।

जब तक श्री हज़ारे किसि भि राजनेतिक पार्टि के नजदिक नहि और जब तक श्री हज़ारे भ्रस्ताचार रुपि दानव के खिलाफ़ है तब तक मै यहि कह्ता रहुङा आम आदमि से- “अन्ना शर्णम गच्छामि” और मै विशाल “शरण गहु मै अन्ना कि!”

और अन्त मे सिर्फ़ इतना केहना चाहुगा हमे श्री अन्ना हज़ारे का हाथ मजबुत करना है और सिर्फ़ और सिर्फ़ इमानदार लोगो को हि अपना बहुमुल्या वोट दे, और अपना मत जरुर दान करे

“मत दान सर्वश्रेठ दान !”

विशाल श्रेस्ठ     (c) 

 

 

नोट- सारे विचार मेरे अपने है और किसि भि तरह कि मतभेद य मनभेद के लिये छमा चाहुङा, तस्विरे हमने गुग्ल से लि है जिस्मे किसि भि प्रकार के कौपिराईट का भान नहि है, 

2 thoughts on ““शरण गहु मै किसकि?”

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s