पादुका वियोग!!

 सन्डे की सुबह कुछ अलसाई हुई थी , अभी तो बस ६.३० ऐ एम् ही हुआ है, चल बस १० मिनट और, लोजी बज गए ७.३०, धत तेरे की!! अब हर काम जल्दी-जल्दी करो |

अरे  रे रे ! आप क्यों चौके? अच्छा जी आप सोच रहे हो काम-काजी युवक सन्डे को इन्नी सुबह उठ जाता है,दरसल बतवा इ है भाई साहब की हम जो है न सातो दिन ड्यूटी बजाते है, 

समझे की नहीं? सन्डे को हम जाते है सेवा देने मंदिर (इसकोंन) १०.३० तक निकल लेते है,फिर बस पाकर के २५ किमी दूर,करब १ घंटा बस से सफर और टोटल करीब २ घंटा लग जाता है घर से मंदिर के सीढियों तक पहुचने मे| 

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लो जी अब मुद्दों पे आ जाते है| मंदिर में हमेशा की भांति ही चहल पहल थी, पर बाद में सुशिल पर्भू और राकेश पर्भू के माध्यम से ज्ञात हुआ की आज काफी सारे भक्त-गण मथुरा औए अन्यंत्र गए है सेवा मे| 

मैं भी करीब 3.३० तक सेवा समाप्त कर अपने चरण कमल को जुटे घर की और ले चला, वहा पहुचने के पश्चात ज्ञात हुआ की हमारा चप्पल (पादुका ) किसी सज्जन भक्त ने अपना बता कर जुटे घर से ले उरे , थोरा दुःख हुआ क्युकी कल (शानिवार) को ही मैंने अपने जीवन में निजी उपयोग के लिए पहली बार एक हवाई चप्पल १७५ रुपये की खरीदी थी, न चाहते  हुए भी ६, ७ लोगो को चप्पल और उसकी कीमत बता दी, मगर अब न तो वो चप्पल मिलना था और न ही वो मिली, उस समय मुझे बचपन में पढ़ा एक शेर याद आ गया – “मस्जिद को जाते सारे नमाजी होशियार , एक बशर आता है जुटे चुराने को!” (शायद शेर अधुरा या गलत पोस्ट हो) 

दरसल हम भक्तगण जयादातर टोकन नहीं लेते बल्कि जुटे को अंदर बिना टोकन के रख कर चल देते है , उसी जल्दबाजी का भुगतान मुझे करना परा, कुछ लोग कहने लगे चलो भगवान जी ने आपकी चप्पल को पसंद कर अपने साथ ले गए, हमें पता है भगवान् जी को हमारे चप्पल में इंटेरेस्ट नहीं है, उनके पास न तो किसी चीज की कमी है न उनको कोई जरुरत है, ये तो उस खास इलाके के कुछ अत्यंत सज्जन प्राणी या भक्त का काम है, जो केवल प्रसाद खाने और इन्ही नेक कामो के लिए मंदिर आते है, प्रभु उनको सद्बुद्धि दे ! हा! और मैं कह ही क्या सकता हु|  

फिर हमने वही से एक जोरी चप्पल ली (दुकान से खरीदी) और निकल परे अपने घर की और|

घर लौटते वक़्त एक सवाल मन मस्तिक में कौंध रहा था , क्या इसीलिए कुछ लोग मंदिर आते है?

शायद इस प्रश्न का उत्तर मैं न धुंधू या जन-बुझ कर इस सवाल को टाल दू , पर सवाल तो सवाल है,      और ये सवाल केवल तब आता है जब कुछ ऐसी घटना घटे और सच मानिये मैं नहीं चाहता की किसी के साथ ये घटना घटित हो , कृपया मंदिर को मंदिर ही रहने दे, वहा लोग पाप छमा मांगने या विनती और मन्नत मांगने जाते है , कुछ लोग शांति तलाशने भी आते है वहा जूते बदलने  या चोरी करने न जाये, ये अलग बात है की जो ऐसे महान कृत्या करते है वो ब्लॉग या फसबूक नहीं पढ़ते ,

मगर हम लिखते तो है ! हाहाहा और जब दिल में बात आती है तो जुबान (ब्लॉग) पे भी आनी चहिये!

 

धन्यवाद् 

 

विशाल श्रेष्ठ  (c)  

One thought on “पादुका वियोग!!

  1. bhai hame bhi ilm hai ki kaesa lagta hai jab aapka juta gayab ho jaye,
    hmne bhi gawaya hai juta aur ham bhi hue the paresan

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