जेपी तुमको न भूल पाएंगे

देश में संपूर्ण क्रांति की अलख जगाने वाले महान समाजवादी लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन आज था, मगर हमें याद नहीं रहा, शायद हमारी याददास्त कमजोर हो गयी है या वोलीवुड के महानायक के जन्मदिन की चकाचौंध में हमारी आंखे चुंधिया गयी,हम भूले तो भूले मगर बात बात पे जेपि का नाम लेकर अपनी समाजवादी और भ्रस्ताचार के विरुद्ध लारायी लरने वाले श्री केजरीवाल को भी उनका जन्मदिन याद नहीं रहा| जेपी के चेलो में  लालू. नितीश, रविशंकर, सुशिल मोदी,बी पि सिंह ,अजित सिंह, मुलायम, जैसे बरे नाम है , जो उनका नाम आज भी लेते है, मगर नितीश के अलावा किसी को भी उनको याद करते नहीं दिखा, कांग्रेस से तो वैसे भी कोई आशा है नहीं मगर जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के लोग भी अपने हीरो को भूल गए लगता है| 

उन्होंने कहा था -मेरी रुचि इस बात में नहीं की कैसे सत्ता हासिल की जाये, बल्कि इस बात में है की कैसे नियंत्रण जनता के हाथ में दे दिया जाये !
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एक ऐसे नेता जिसने सत्ता के शीर्ष पे बैठे लोगो को धुल चटा दी,मगर खुद कभी भी किसी पद से चिपके रहना पसंद नही किया, जिसने हुंकार भरी – “सिंहासन खाली करो की जनता आती है” (रामधारी सिंह के कविता) और एक लाख जनता उस समय (१९७५) में रामलीला मैदान पहुची थी| 
महात्मा गाधी,जवाहरलाल नेहरू और वह आचार्य विनोभा भावे से प्रभावित जेपी सबसे अलग सोच रखने वाले समाजवादी नेता थे,उनका जन्म बिहार के पावन भूमि में 11 अक्टूबर,1902 को सारण के सिताबदियारा में हुआ था। पिता श्री हसनू दयाल औए माता जी फूलो रानी बहुत ही सिम्पल धार्मिक परिवार से थे, माता जी से उनको काफी लागाव था और उनसे प्रभावित भी| उन्हें भगवद गीता से काफी प्रेरणा मिली और उन्होंने अपने जीवन में आत्मसात कर लिया, ९ साल के उम्र में वो पटना पढने के लिया गए, १९१८ में दसवी के परिछा में  जिला मेरिट स्कोलोरशिप का पुरुस्कार जीता| १८ साल के उम्र में प्रभवति जी से १४ अक्टूबर १९२० को शादी हुए, ब्रज किशोर प्रभावती के पिता ने प्रभावती जी को कस्तूरबा गांधीजी के साथ गाँधी आश्रम अहमदाब भेज दिया, खिलाफत आन्दोलन में भागीदारी निभाई और अंग्रेजो के कालेज पटना को छोर के बिहार विद्यापीठ से पढाई की,पटना से पढ़ाई करने के बाद वह उच शिक्षा के लिये अमेरिका(१९२२) गए, लेकिन उनका मन में भारत के स्वाधीनता संग्राम में योगदान देना का संकल्प हमेशा हिलोरे मारता रहा,और सेपतेम्बर १९२९ को भारत के ओर निकले नोवेम्बर को भारत वापुस आये,प्रभावती देवी उस समय तक गाँधी आश्रम में थी,

 प्रभावती के कहने पर गांधी से मिलने साबरमती आश्रम गए। गाँधी जी ओर नेहरूजी दोनों से साथ ही मुलाकात हुए, नेहरूजी ने सीधे तौर पे जेपी को योगदान देने को कहा, ओर जेपी नेहरूजी के साथ कूद परे,नेहरू के ही कहने पर जेपी काग्रेस के साथ जुड़े, आज़ादी की लारायी में बार बार जेल गए ओर अंगेजो की आंख की किरकिरी बन चुके जेपी नासिक जेल में राम मनोहर लोहिया ओर मिनो मसानी से १९३२ में मिले ओर उसके बाद उनकी भागीदारी आक्रामक हो गयी|

१९ अप्रैल १९५४ को आजादी के बाद वह आचार्य विनोभा भावे और उनके सर्वोदय आदोलन से जुड़े। उन्होंने लंबे वक्त के लिए ग्रामीण भारत में इस आदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने आचार्य भावे के भूदान के आह्वान का पूरा समर्थन किया। जेपी ने ५० के दशक में ‘राज्यव्यवस्था की पुनर्रचना’ नामक किताब  लिखी। इसी पुस्तक को आधार बनाकर नेहरू ने ‘मेहता आयोग’ का गठन किया था। शायद  सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात शायद सबसे पहले जेपी ने उठाई थी।  १९६० में प्रधानमंत्री नेहरू की कोशिश के बावजूद वह उनके मंत्रिमंडल शामिल नहीं हुए ये साबित करता है की उनको सत्ता का मोह कभी नहीं था| बाद में वो बिहार की राजनीती ओर समाजसेवा में कूद परे, कौन नहीं जनता की ७४ में विधार्थी आन्दोलन सुरु की ओर राजनीती की दिशा ही बदल दी, सन १९७४ में वी एम् तर्कुंदे के साथ मिल कर Citizens for democracy  ओर १९७६ में People’s Union for Civil Liberties एन जी ओ बनाया जिसने समाजसेवा ओर नागरिक अधिकारों के लिए कार्य की, जेपी ने पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में विशाल जनसमूह को संबोधित किया। यहीं उन्हें ‘लोकनायक’ की उपाधि दी गई| जयप्रकाश मैगसायसाय पुरस्कार से सम्मानित हुए और मरणोपरात उन्हें ‘भारत रत्‍‌न’ से विभूषित किया गया

 । मगर सन ७७ न होता तो हम जेपी के शक्ति को समझ नहीं पाते, सन ७५ में अलहबाद हायकोर्ट के द्वारा इंदिरा गाँधी की जित को कानून के खिलाफ कहा तो जेपी खुल कर इंदिरा के खिलाफ कूद परे, उन्होंने इस्तीफा माँगा ओर आन्दोलन सुरु कर दिया, ओर सम्पूर्ण क्रांति की रूप रेखा तैयार की, सम्पूर्ण क्रांति जिसे सरे देश ने हाथो-हाथ लिया, २५ जून ७५ को इंदिरा गाँधी ने घबरा कर इमरजेंसी लगा दी, आपातकाल- सरे नागरिक अधिकारों की निर्मम हत्या, लोकतंत्र के नाम पे कलंक , एक काला अध्याय!
रास्त्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के कविता से प्रभावित हो एक जय घोष किया जेपी ने हुंकार भरी – “सिंहासन खाली करो की जनता आती है” (रामधारी सिंह के कविता) और एक लाख जनता उस समय (१९७५) में रामलीला मैदान पहुची थी| राजनीती की दिशा बदल दी, इंदिरा की सत्ता के खिलाफ सारा देश जेपी के साथ खरा हो गया, ७७ में चुनाव हुए जेपि की जित ओर इंदिरा की हार हुई | २ साल बाद अपने ही लोगो की अति-महत्वकांछा के कारन सरकार गिर गयी, कोई न एक बदलाव तो आ ही गयी देश में| 
मगर इसके बाद की घटना काफी दुखद है, भारत का इतिहास रहा है की गांधीजी के हत्या के बाद किसी भी राजनेताओ की हत्या नहीं होता (आतंकवादी घटना छोरके) दुर्घटना होती है, लो! हो गयी एक ओर दुर्घटना! 
पटना बिहार ०८ ओक्टुबर ७९ अपने जन्मदिन के केवल ३ दिन पहले उनका निधन हो गया,७७ के आन्दोलन के जनक ७७ साल पूरा न कर सके, हृदय अघात ओर डायबिटीज के इलाज के लिए हस्पताल में भर्ती जेपी का निधन अचानक ही हो गया, मेरा मानना है की ये एक विवाद का विषय है, हा कोई साबुत नहीं दे सकता मैं, पूरा बिहार ओर उत्तर प्रदेश की साडी दुकाने ओर ऑफिस बंद हो गयी ओर समूचा भारत जेपी के निधन पे शोकाकुल हो गया|।
एक युग का अंत !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

जेपी तुम चले गए मगर हमारे हृदय से तुम्हे कौन निकालेगा , एक युग का अंत हो गया मगर एक युग की शुरुवात कर गए 
सचमुच जेपी तुमको न भूल पाएंगे 

 

विशाल श्रेष्ठ

 

नोट- हर किसी को अपना तर्क रखने का हक है, मेरे लेख से मतभेद होना आपका अपना निजी विकार होगा, आपका स्वागत है, कृपया विवाद न करे ओर स्वतंत्र विचारधरा  के पेरोकर बनके स्वस्थ परम्परा को आगे बढ़ाये

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