पिया मोरा परदेसी (a poem)

पिया मोरा परदेसी

 

बेदर्द सर्दी , दर्द का जाने , पिया मोरा परदेसी है|
मुझ  बिरहन की पीर न जाने , पिया मोरा परदेसी है|
नई बियाहे , घर लेके आये ,दो चार दिनों में दियो बताये,
जा रहा परदेश , तू खुश  रहियो ससुराल में ,
मैं पूछो, जरा दियो बताय, कैसे खुश रहू इस हाल में,
न देखू तुझको जिस जिस पल, मोरा जिया जले है,
मुझ बिरहन का घर तो बस बिरह से चले  है ,
ऊपर से सर्द हवा को झोका, जब छुवे है,
सच कहू मोरा रोम रोम, तेरे छुवन को चाहे रे  , 
श्रृंगार करूँ किस कारण, कौन मोरा मन भाये  रे ,
ना दर्पण देखू, न देखू कौन क्या समझाए रे,
तोरा बिन एक पल मोरा चैन न आये रे,
अब तो आजा, बरस भयी, नैन राह टके जाये  है, बेदर्द सर्दी , दर्द का जाने , पिया मोरा परदेसी है|

(c) vishal shresth     

 
 
note- kindly share or post my poem with my name only
thanks 

4 thoughts on “पिया मोरा परदेसी (a poem)

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