सार्थक सिनेमा और भ्रस्टाचार कि लड़ायी

आजकल हर जगह भ्रस्टाचार  के खिलाफ एक माहोल बनता दिख जायेगा , हर जगह येही बाते होती हैं और हद तो तब है जब भ्रस्ट लोग भी कहते है की हम भ्रस्टाचार  के खिलाफ है, जो भी हो एक माहोल तो बनता दिख रहा है, इसी बीच कई फिल्मे आई और गयी, जिन फिल्मे को देखने मैं गया और मैंने उसे सराहा वो फिल्मे पिट गयी , क्युकी लोग समाज सुधरने की बात तो करते है, लोग भ्रस्टाचार के खिलाफ बात तो करते है मगर इन मुद्दों पे बनी फिल्मे देखने नहीं जाते , पिछले साल जून  माह में एक फिल्म आई थी – “संघाई” -अभय देओल ,इमरान हासमी और कल्कि अभिनीत फिल्म को दिवाकर  बनर्जी ने बनाया था  भ्रस्टाचार और भू माफिया के खिलाफ ये फिल्म थी, ये भी दिखाया गया किस तरह राजनेता और मंर्त्री की मिलीभगत से इतना बरा घोटाला और अन्याय गरीब लोगो के खिलाफ होता है, कुछ ऐसा ही आज के परिवेश में श्री गडकरी जी और श्री शरद जी के मिली भगत से हुआ है (वाय पि सिंह और अंजलि दमनिये के अनुसार ) लवासा शहरी परियोजना पुणे के पास जिससे  सरकार  और गरीब जनता  दोनों  को नुकसान  है मगर सब चुप है| Imageकोइ हमारा नहि और हम किसि के नहि!

इसी तरह प्रकाश झा की फिल्म आयी  “चक्रव्यूह ” इसी ओक्टुबर माह में जिसमे अभय देओल,अर्जुन रामपाल और मनोज वाजपेयी ने मुख्या भूमिका निभाई है,जिससे सायद दर्शक पसंद भी करे और बॉक्स ऑफिस पे कुछ कमाई भी हो जाये, पहले तो मैं इस फिल्म की गीत की चर्चा करू जो की विवाद में है , मगर ये गाना आज के परवेश में सर्वथा उचित है, मैं इस गाना की पंक्तिया पोस्ट कर रहा हु और आशा करता हु की कोई विवाद न हो – 

“भैया देख लिया है बहुत तेरी ये सरदारी रे …..
अब तो हमरी बारी देना ……………
महंगाई महामारी हमरा पैसा खा लिया
गरीबी हटाने गए थे, गरीबो को हटा दिया…
सरबत की तरह देश को…
गटका है गटागट…….

आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट!!!!
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट!!!!
बिरला! हो या टाटा! अम्बानी! हो या हो बाटा!!
अपने-अपने चक्कर में देश को है बाटा!!
अरे! हमरे ही खून से इनका
इंजन चले चले धकाधक!!
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट!!!!
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट!!!!””
Image
 
चक्रव्यूह फिल्म नक्सलवाद और सरकारी  निकम्मिता को दर्शाती है, किस तरह करीब १०० से भी जयादा जिलो में इन नक्सलवादियो की समानांतर सरकारे है और सरकार भी लगभग उदासीन है| कैसे हमारे ही जमीन पे हमारे भाई मारे जाते है, 
दोनों और से मारे जा रहे है, माँ भारती के लाल एक दुसरे के खून के प्यासे हो गए है, क्यों? क्युकी विकास आजतक वह| पहुच नहीं पाया है उस पर से जमींदार किस्म के लोग और सरकारी बाबु के जुल्म का नतीजा है या हो सकता है|, ये हमारी और आपकी उदासीनता का नतीजा भी है, हमें सरकार से पूछना चाहिए की कब तक आखिर  ये  होता रहेगा?
आखिर कब जागेंगे हम?, कभी तो मेहेंगाई और अपने छोटे-मोटे मुसीबतों को छोर कर इन बरी मुसीबतों से लरे, भ्रस्ताचार और नक्सलवाद बहुत बरी समस्या है, और ये हमारे देश की जरे काट रही है, आज श्री अन्ना हजारे, श्री वाय पि सिंह, रिटायर्ड  जेनरल  वि के सिंह , किरण बेदी, मेघा  पाटेकर और जस्टिस संतोष हेग्रे आदि  जैसे समाज सेवक है जो इन समस्याओ के खिलाफ मोर्चा खोल रखे है, हमें इनका साथ देना चाहिए और ये हमारा भारत है हमें अपनी जिम्मेदारी को निभाना चाहिए |
साथ ही सार्थक सिनेमा के नाम पे बन्ने वाली इन समाज के आइना स्वरुप फिल्मो से काफी कुछ सीखना चाहिए हमें, और रोमांस और लव सेक्स के अलावा भी फिल्मे बनती  है जिसे सराहा जाना चाहिए|
और अंत में विदा लेते  समय किसी भी प्रकार के त्रुटी के लिए छमा-प्रार्थि हुँ, इमेज फिल्मो के विज्ञापन से लिया गया है!
  धन्यवाद !
 
विशाल श्रेष्ठ 

5 thoughts on “सार्थक सिनेमा और भ्रस्टाचार कि लड़ायी

  1. बिरला! हो या टाटा! अम्बानी! हो या हो बाटा!!
    अपने-अपने चक्कर में देश को है बाटा!!
    अरे! हमरे ही खून से इनका
    इंजन चले चले धकाधक!!
    आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट!!!!
    आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट!!!!””
    perfect words hai aaj ke halat pe, sab ke sab chor hai aur political support bhi inke sath hai, inka koi kuch nhi bigar sakta

    • yes geetkar ne sara dard piro kar likha hai, magar filmkar sayad is geet ke sath nayay nahi kar sake,
      jaha tak bhrstachariyo ki bat hai ab kuch logo ki awaj inlogo ko chain se jine nahi degi

    • yes geetkar ne sara dard piro kar likha hai, magar filmkar sayad is geet ke sath nayay nahi kar sake,
      jaha tak bhrstachariyo ki bat hai ab kuch logo ki awaj inlogo ko chain se jine nahi degi

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