साधू और सन्यासी

संतो का उचित सम्मान करते हुए मेरे कुछ सवाल है जो की मुझे कम से कम उचित प्रतीत होती है, मैं वैस्नव  हू  और मेरा समय भग्वद गीता और श्रीमद भागवत महापुराण  अध्यन  में भी बीतता है,  मगर यहाँ मैं आम आदमी की भाषा में बात करना चाहूँगा।

माला तो कर में फिरे , जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो दसु दिश फिरे , यह तो सुरमित नहीं!!
संत कभी भी यहाँ वहा  की निरर्थक बातो में अपना धयान नहीं लगाते , कबीर ने तो इसे आम आदमी के लिए भी निषेध किया था।
कबीर मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर , पानछे  लगा हरी फिरे कहत कबीर कबीर !!
संतो का मन निर्मल हो और पाप और लाभ से दूर हो,वो इतने निर्मल और प्यारे हो की स्वयं प्रभु भी उनके नाम लेते फीरे ।
अब यहाँ देखे- क्या है स्‍वामी नित्‍यानंद सेक्‍स स्‍कैंडल… पढ़ें http://bit.ly/YcfVbK , कुभ में ही एक प्रसिद्ध अखारे ने स्वामी नित्यानंद को महा-मंडलेस्वेर घोषित किया,
राधे माँ को भी आप जानते है, कितनी महान है ये राधे माँ, इनको भी  महा-मंडलेस्वेर घोषित किया फिर हटा दिया, फिर घोषित कर दिया, 
और कुछ विशेष प्रकार के संतो ने किसी राजनेतिक व्यक्ति को पि एम् पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया, 
ये क्या हो रहा है, क्या यही संतो का आचरण है 
अब संतो की परिभाषा शास्त्रों में भी देखे-                                                                            दू:खेषवनुदिग्रमना सुखेषु विगतस्पृह :
वित् राग:भय क्रोध: स्थितधी मुर्निरुच्य्ते :: (2:56 गीता )–                                                              अर्थ:– जो त्रय तपो के होने पर भी मन विचलित नहीं होता अथवा सुख में प्रसन्ना नहीं होता, और आसक्ति भय तथा क्रोध से मुक्त है वो स्थिर मन वाला मुनि/साधू है:
 
अनाश्रित: कर्मफलं : कार्य कर्म करोति य:।
स सन्यासी च योगी च निर्ग्रीन्र  चक्रीय: (6:1)
सन्यासी या योगी वह है जो  कर्म फल के  प्रति अनासक्त है, और जो अपने कर्तव्यो का पालन करता है, न की वह जो अग्नि जलाता है न कर्म करता है,
 
निराशिर्यत चित्तात्मा तयक्ता सर्व्परिग्रिह:
शरीर केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोती किल्बिषम (4:21 गीता)
अर्थ: — साधू या मुनि पूर्ण: रूप से संयमित मन तथा बुध्दि से कार्य करते है,अपने सारे संपत्ति को त्याग देते है,और केवल शारीर निर्वाह के लिए कार्य करते है,और इसी प्रकार वो पाप रूपी कार्यो से प्रभावित नहीं होते 
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आदि गुरु शंकराचार्य जी के परम्परा पे आज कितने सन्यासी चलते है 
 
विधाविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तनी :
शुनि चैव श्वपाके च पंडिता: समदर्शिन:।। (5:18)
विधा विनय से ब्राह्मण/साधू  संपन्न होते है और गाय हाथी कुत्ता चंडाल को सम  भाव से देखते है । 
 
संछेप में साधू या योगी जरुरत पर्ने पे राजनेतिक या सामाजिक परिस्थिति में हस्तछेप  कर सकते है, मगर उनका किसी को भी आगे या पीछे ले जाने पे जोर न देके सत्य, संस्कार और धर्म  पे धयान दे, योगी साधू या संन्यासी  कभी भी आलिशान महलो या आलिशान होटलों के आदि नहीं होते, और न ही यो किसी  राधे माँ या किसी नित्यानंद और चंद्रास्वामी जैसो को कोई उपाधि दे, पैसो और अर्थ का खेल तो केवल सामान्य लोगो के लिए है न की साधू या संयाशियो के लिये 
इसलिए अर्थ मोह और माया से दूर रहे और किसी भी धूर्त और पाखंडी को अपने शुद्ध और संस्कारी जमात में शामिल न करे 

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