ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई – love is god – love is all-around

प्रेम-प्यार-इशक़-माया-अनुराग-प्रीत और न जानें कितने नाम है इस पवित्र रिस्ते के , न जानें कितने तरह के भाव है
न तो कोई सीमा है न कोई बंधन है , ये तो बस उरना जनता है प्यार बाटना जानता है !
पोथी-पोथी पढ़ जग मुआ , पंडित भया न कोई
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई !!
कबीरदास ने क्या सही कहा था , मैं तो नत मस्तक हु उनके इस विचार पे , इस सन्देस पे !
प्रकृति ने या उस नीले छतरी वाले ने कोई बंदिसे बन्दों पे नही लगायी ये तो हम है जिन्होंने मानव को मानव से बाटा,
पहले धर्म के नाम पर, फिर जात के नाम पर फिर रास्ट्रीयता के नाम पर, रंग-भेद के नाम पर फिर बाटा आमिर-गरीब के नाम पर
, बस बाटते रहे – बस बाटते रहे, और जिन्होंने भी जोरने का प्यार का धागा पिरोने का कम किया उन्हें पागल घोषित कर दिया !
खैर यहाँ मैं अपने पे आता हुँ !
मैं काफी खुस था अपने प्यार में , बरा भरोसा था, साथ जीने-मरने कि कस्मे भी दोहराता था
मगर आज से ११ साल पहले सिर्फ इसलिए मुझे छोर दिया गया ( शायद ) क्युकी मेरा सरनेम श्रेस्ठ था
और उनका कुछ और ……….
न उम्र कि सीमा हो न जन्म का हो बंधन – जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन …………………………………………

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और हम आज भी उनके है
विशाल श्रेस्ठ

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शिक्षक दिवस कि सार्थक्ता (5 september Teacher’s Day)

Happy teacher’s day dear friends, this is my old post , i am reblogging this, kindly like and share your views

vishal shresth

गुरु रे ब्रम्हा गरु रे विषनू  गुरु रे देवो महेषवर​:

गुरु रे सांछात पब्रम्हा तस्मेः श्रि गुरुबे नम​:

अर्थ्::

गुरु हि ब्रह्मा है, गुरु हि विश्नु है, गुरु हि देव महेश है ,

गुरु हि सक्छात परमेश्वेर है, एसे गुरु को मेरा सत सत नमन ॥

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शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ अपना पोस्त्\गद्य कि शृरुवात करना पसन्द करुंगा,

हमारे भारत मे  गुरू होते थे और शिष्य ! दोनो मे अघाद्य प्रेम कि परम्परा रहि है, अपना यह देश परम्परओं का देश है और परम्परा एक धारा होती है , नदि कि अविरल धारा, जो निरन्तर अविकल बहती है नदि कि अविरल धारा समय के सथ-साथ अब बदल गयी है,

अब ये परम्परा  गुरु-परम्परा   खत्म होति प्रतित हो रहि है, गुरू और शिष्य ! दोनो मे अघाद्य प्रेम कि परम्परा और निस्वार्थ शिछा देने कि भावना खत्म होति प्रतित हो रहि है, अब  गुरु तो रहे नही शिछक मिल्ते…

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शिक्षक दिवस कि सार्थक्ता

गुरु रे ब्रम्हा गरु रे विषनू  गुरु रे देवो महेषवर​:

गुरु रे सांछात पब्रम्हा तस्मेः श्रि गुरुबे नम​:

अर्थ्::

गुरु हि ब्रह्मा है, गुरु हि विश्नु है, गुरु हि देव महेश है ,

गुरु हि सक्छात परमेश्वेर है, एसे गुरु को मेरा सत सत नमन ॥

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शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ अपना पोस्त्\गद्य कि शृरुवात करना पसन्द करुंगा,

हमारे भारत मे  गुरू होते थे और शिष्य ! दोनो मे अघाद्य प्रेम कि परम्परा रहि है, अपना यह देश परम्परओं का देश है और परम्परा एक धारा होती है , नदि कि अविरल धारा, जो निरन्तर अविकल बहती है नदि कि अविरल धारा समय के सथ-साथ अब बदल गयी है,

अब ये परम्परा  गुरु-परम्परा   खत्म होति प्रतित हो रहि है, गुरू और शिष्य ! दोनो मे अघाद्य प्रेम कि परम्परा और निस्वार्थ शिछा देने कि भावना खत्म होति प्रतित हो रहि है, अब  गुरु तो रहे नही शिछक मिल्ते है , जिन्से  निस्वार्थ शिछा कि अपेक्छा नहि, आज विध्यलया नहि स्कृल मिल्ते है वो भि प्राइभेत स्कुल, वहा शिष्य नहि मिल्ते , मिल्ते है विध्यार्थि ,            . विध्या ( ग्यान्\एदुकेशन्) +  अर्थ (मनि\पैसा)= पैसा है तो शिछा

नहि है, तो निचे वर्नित फोटो के तरह अध-कचरा ग्यान ले या कचरा उथाये, दुखद्: , दुसरे तरफ़ बैग उथाये बच्चे जो प्राइभेत स्कुल को जाते है,

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ये प्राइभेत स्कुल के नखरे भि कम नहि है, काफ़ि महङे और काफ़ि भिड़-भाड़, गुरु-शिष्य परम्परा खत्म ,शिष्य अर्थ्-परम्परा शृरु ,

गुरु—- ह्म्!!!!!!!!!!!

गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तान्निरोधकृत ।

अन्धकारविनाशित्वाद गुरुरित्यभिधीयते ॥

गु-जो अन्धकार , रु- हाटाना\साफ़ करना, जो अन्धकार को हटा कर ग्यान का प्रकाश फ़ैलाये वो गुरु होते है।

इस अर्थ युग मे एसे गुरु क होन| थोड़ा मुशकील लग्ति है।

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आज के आज़ाद भारत मे गुरु-शिष्य परम्परा को जारि रखी जा रहि है ड़ाक्टर सर्वपल्लि राधाकृष्णन के जन्म्-दिन के शुभ अवसर पर ५ सितम्बर को । ५ सितम्बर  १९८८ को इन्का जन्म  चेन्नइ मे हुआ था, वो भारत के द्वतिय रश्त्रापति बने,

पुस्तकें वो साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों  के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं.

–  सर्वपल्ली राधाकृष्णन

शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके.

–   सर्वपल्ली राधाकृष्णन

एसे महान पुरुष के जन्म दिवस पे उन्को सत सत नमन्

पर दोस्तो ,गरिबो को शिक्षा  का अधिकार मिले. सरकारि स्कुल उचित धंग से चले
वहा गरिब बचचो को उन्न्त भविस्या बनाने का मौका मिले, शिक्षक शिक्षा दे अर्थ से मुक्त शिक्षा दे,
सुधार कि आवस्य्क्ता है, जिस्से हामारा भारत शिक्षित भारत बने ,जब तक शिक्षा को हम अर्थ से मुक्त नहि कर दे, जब तक हमारे सारे बच्चे को शिक्षा  का अधिकार ना मिले तब तक शिक्षक दिवस कि सार्थक्ता पे मै सवाल उथाते रहुंगा,

अपका
विशाल श्रेस्ठ
फोटो हम्ने अपने दोस्तो के फ़.बि. वाल से लिया है! और पोस्त हमारे मन कि अभिव्यक्ति मात्र है
धन्यवाद्